सनातन धर्मशास्त्रों एवं स्कन्दपुराण काशीखण्ड के अनुसार, जब अविमुक्त क्षेत्र आनन्दवन काशी में पग-पग पर भगवान रुद्र-स्वरूप प्रतिष्ठित अंकुररूपी मुक्तिप्रद देवविग्रहों-शिवलिंगों की महिमा का वर्णन होता है, तब परम प मोक्षलक्ष्मी मणिकर्णिका तीर्थ के तट पर स्थित दिव्य निम्नगेश्वर(निम्नगा:+ईश्वर= नदियों का स्वामी ) शिव की महिमा के प्रसंग में देवाधिदेव महादेव माता पार्वती से बोले- महादेव बोले-हे देवी! जब गंगा का काशी में अवतरण नहीं हुआ था, उससे पूर्व काशी के मणिकर्णिका क्षेत्र में नाना ऋषियों ने मेरा अभिषेक करने की इच्छा व्यक्त की। यद्यपि उस समय वहां नारायण द्वारा निर्मित चक्र-पुष्करिणी कुंड विराजमान था, किंतु ऋषियों की अभिलाषा थी कि वे विभिन्न तीर्थों में प्रवाहित होने वाली नदियों और उनके राजा समुद्र देव के जल से मेरा अभिषेक करे।हे देवी! वे सभी ऋषि विचार-विमर्श कर हमारे परम भक्त अगस्त्य मुनि के पास गए, जो काशी में नित्य निवास कर श्रद्धापूर्वक मेरी उपासना करते थे। ऋषियों ने कहा-हे प्रभु अगस्त्य! आप सर्वज्ञ और सर्व-समर्थ हैं। महादेव के प्रति आपकी प्रीति अगाध है। काशीपति के अभिषेक और पूजन हेतु आप वर्तमान में विद्यमान समस्त नदियों के जल को उपलब्ध कराने की कृपा करें, जिससे हम महेश्वर की विधिवत आराधना कर सकें। महादेव बोले-हे विशालाक्षी! ऋषियों की प्रार्थना पर अगस्त्य मुनि ने मणिकर्णिका तट पर ‘सूर्य द्वार’ के समीप नाना नदियों और सूर्य देव का आवाहन किया। मेरे भक्त के बुलाने पर सभी नदियां वहां दिव्य नारी रूप में प्रकट हो गईं। वे सभी अपने ऐश्वर्य से युक्त थीं और उन्होंने कलशों में अपनी-अपनी धाराओं का जल प्रकट किया। मेरे अर्चन हेतु वे सभी देवियां भी वहीं रुक गईं। हे प्रिये! जब अगस्त्य जी के सानिध्य में सभी ऋषियों और नदियों ने मेरे ‘महेश्वर लिंग’ का अभिषेक किया और नाना स्तुतियों से हमें संतुष्ट किया, तब मैंने उन्हें आपके साथ अर्धनारीश्वर रूप में दर्शन दिए और कहा— महादेव बोले – हे ऋषिगण! मैं आप सभी पर अत्यंत प्रसन्न हूँ। मेरी अनन्य भक्ति के प्रभाव से आप सभी को मोक्ष की प्राप्ति होगी। इस अनुष्ठान में इन दिव्य नदियों ने भी अपनी जल-धाराओं से मुझे परम संतुष्ट किया है; अतः आप सभी अपने-अपने नाम से यहाँ पृथक-पृथक शिवलिंगों की स्थापना करें। सत्ययुग की समाप्ति पर ये समस्त लिंग मुझमें ही विलीन होकर एकाकार हो जाएंगे और ‘निम्नगेश्वर’ के नाम से विख्यात होंगे। इन शिवलिंगों की स्थापना के पुण्य-प्रताप से, मैं और भगवती विशालाक्षी इन समस्त नदियों के तटों पर सदैव विराजमान रहेंगे, जिससे पृथ्वी की सभी नदियां, कुंड और सरोवर ‘तीर्थ’ की पदवी प्राप्त करेंगे। सत्ययुग तक यहाँ मेरे और आप लोगों द्वारा स्थापित लिंगों के केवल दर्शन मात्र से ही जीव को तत्काल मोक्ष प्राप्त हो जाएगा। महादेव बोले – द्वापर युग के अंत से लेकर कलियुग के ३४०० वर्ष व्यतीत होने तक यह ‘निम्नगेश्वर लिंग’ प्रत्यक्ष रूप से विद्यमान रहेगा। किंतु, कालान्तर में जब काशी के भक्त देवी विशालाक्षी के स्वरूप और नाना तीर्थों की मर्यादा की उपेक्षा कर केवल मेरा पूजन करेंगे, उस समय हे देवी आप का विशालाक्षी विग्रह खंडित हो जाएगा। विशालाक्षी की प्रसन्नता में ही मेरी प्रसन्नता निहित है; अतः आप के अप्रसन्न होने पर काशी में समय-समय पर भीषण संहार होंगे और अन्य अनेक शिवलिंगों की भाँति यह ‘निम्नगेश्वर’ लिंग भी अंतर्धान (लुप्त) हो जाएगा। तथापि, लुप्त होने के पश्चात भी इस स्थान पर मेरे भक्तों को पूजन का अक्षय फल प्राप्त होता रहेगा। जो भक्त यहाँ समस्त नदियों का स्मरण कर ‘चक्र-पुष्करिणी कुंड’ में विधिपूर्वक स्नान करता है और मेरा दर्शन करता है, वह संसार के समस्त तीर्थों में स्नान और अभिषेक का पुण्य प्राप्त कर लेता है। जो निम्नगेश्वर के समीप पितरों के निमित्त तर्पण करता है, उसके पितर सौ वर्षों तक तृप्त रहते हैं। जो कृषक अथवा जल-सेवी (मछुआरे, नाविक आदि) यहाँ श्रद्धापूर्वक पूजन करते हैं, उनके क्षेत्र में कभी अकाल नहीं पड़ता और जल के स्रोत सदैव अक्षय रहते हैं। उत्तर में स्थित होने के कारण यह संपूर्ण क्षेत्र साक्षात ‘ज्ञान’ का स्वरूप है। तत्पूर्वतो राक्षसेशो गङ्गेशस्तस्य दक्षिणे ।तदुत्तरे निम्नगेशाः सन्ति लिङ्गान्यनेकशः ॥ २०७ उसके पूर्वभाग में राक्षसेश्वर और दक्षिण ओर गंगेश्वर हैं; पर उत्तर प्रान्त में तो बहुत से निम्नगेश्वर वर्तमान हैं । ध्यातव्य हो- मणिकर्णिका तीर्थ की दक्षिण सीमा गंगा केशव स्थान (ललिता घाट) पर माता गंगा मूर्तिमान होकर विराजमान है, और मणिकर्णिका के उत्तर द्वार समीप निम्नगेश्वर भगवान महेश्वर के सानिध्य में विद्यमान है।पता- श्री निम्नगेश्वर महादेव मंदिर, मणिकर्णिका तीर्थ तट पर मणि में हैं वाराणसी (सेवएत – शुक्ल परिवार)
श्री आदित्येश्वर महात्यम् और सूर्य का वह मूर्तिमान हो कर विराजमान होना
पार्वत्युवाच नमोऽस्तु ते देवदेव महादेव जगत्पते।मणिकर्णिकाया माहात्म्यं श्रुतं विस्तरतःप्रभो॥१कौतूहलं मे महदस्ति हृदये करुणानिधे।यत्र साक्षात्सहस्रांशुः तपस्तेपे सुदुस्तरम्॥२किं निमित्तं महाराज भास्करो धर्मभास्वरः।तत्याज गगनं रम्यं मणिकर्ण्युदके स्थितः॥३कथं तेन प्रतिष्ठाप्य लिंगं ज्योतिर्मयं शुभम्।कथं चाराधितो देवः तन्मे ब्रूहि वृषध्वज॥४किं तस्य तपसो वीर्यं किं फलं च तपस्विनः।कथं मूर्तिधरः सूर्यो ह्यभवत्तव संनिधौ॥५ ईश्वर उवाच शृणु देवि प्रवक्ष्यामि गुह्याद्गुह्यतरं शुभम्।यच्छ्रुत्वा मुच्यते जन्तुः जन्मसंसारबन्धनात्॥६वाराणसीति विख्याता मम देहसमुद्भवा।तत्र सामणिकर्णी च मुक्तिमण्डपिका शुभा॥७तस्यास्तटे समभ्येत्य रविः परमभक्तिमान्।संसाररोगनाशाय लिंगमाराधयत्परम्॥८स संचिन्त्य जगन्नाथं बालुकामयमीश्वरम्।स्थापयामास देवेशि मणिकर्ण्यतटे शुभे॥९निराहारो जितक्रोधः पञ्चाक्षरजपे रतः।संवत्सरसहस्राणि तपस्तेपे दिवाकरः॥१०तस्य भासा महादेवि गगनं भासितं भृशम्।तपसा निर्जितं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम्॥११ततोऽहं तस्य पुरतः प्रादुरासं वरानने।तेजसां राशिमक्षय्यं तं दृष्ट्वा प्राह मं वचः॥१२प्रसन्नोऽस्मि सहस्रांशो तपसाऽनेन सुव्रत।वरं वृणीष्व दास्यामि यत्ते मनसि संस्थितम्॥१३ सूर्य उवाच यदि देव प्रपन्नोऽसि यदि देयो वरो मम।त्वत्सान्निध्यं सदा भूयान्मणिकर्ण्यतटे शुभे॥१४स्थापयित्वा तु लिंगं मे यत्पुण्यं लभते जनः।तदर्धं मे प्रदातव्यं शिवभक्तिरचञ्चला॥१५ ईश्वर उवाच ममैव तेजसा ह्यत्र लिंगरूपेण संस्थितः।त्वन्नाम्ना ख्यातिमेष्यन्ति लोकाः सर्वे चराचराः॥१६आदित्येश्वर इत्येवं नाम्ना लिंगं भविष्यति।यस्य दर्शनमात्रेण नरः पापैः प्रमुच्यते॥१७त्वं चापि विग्रहेणैव अत्रैव तिष्ठ भास्कर।मूर्तिमान्सर्वलोकानां तापहर्ता सुनिर्मलः॥१८भविष्ये मम लीलया त्वं विमोहितो दिवाकर।द्वादशधा विभक्तश्च रक्षिष्यसि पुरीं मम॥१९नाना रूपैश्च भक्तानां करिष्यसि सदा शुभम्।कल्याणं विविधाकारैः कुरु त्वं मत्प्रसादतः॥२०यस्त्वां पश्यति भक्त्या च मणिकर्ण्युदके स्नातः।न तस्य व्याधिजं दुःखं दारिद्र्यं नैव जायते॥२१विशेषतः सूर्यवारे यः करिष्यति पूजनम्।षष्ठ्यां वा सप्तमी तिथ्यां तस्य पुण्यमनन्तकम्॥२२चक्षूरोगं विनाशाय त्वं हि देवः सनातनः।त्वत्प्रसादान्मनुष्योऽसौ दिव्यचक्षुः प्रपद्यते॥२३गङ्गातोयेन संस्नाप्य आदित्येश्वरमव्ययम्।यः पूजयति देवेशि स याति परमां गतिम्॥२४अर्कपुष्पैश्च रक्तैश्च धूपदीपनिवेदनैः।यः करोति मम प्रीतिं स लभेत्सूर्यवत्प्रभाम्॥२५इत्थं तत्र मया दत्तं वरदानं सुदुल्लभम्।तदाप्रभृति सूर्योऽसौ तत्रैव स्थितवान्शुभे॥२६ संदर्भ – काशी रहस्य हिंदी अनुवाद —- पार्वती जी ने कहा हे देवों के देव, महादेव! हे जगत्पते! आपको नमस्कार है। हे प्रभु, मैंने आपके मुखारविंद से मणिकर्णिका का विस्तारपूर्वक माहात्म्य सुना। हे करुणानिधि! मेरे हृदय में एक बहुत बड़ा कौतूहल (जिज्ञासा) है कि जहाँ साक्षात् सूर्यदेव ने अत्यंत कठिन तपस्या की थी। हे महाराज! धर्म को प्रकाशित करने वाले भगवान भास्कर ने उस रमणीय आकाश मंडल को छोड़कर मणिकर्णिका के जल में स्थित होकर तप क्यों किया?हे वृषध्वज! उन्होंने वहां उस शुभ ज्योतिर्मय लिंग की स्थापना कैसे की और किस प्रकार आपकी आराधना की? वह मुझे बताइये।उन तपस्वी सूर्य की तपस्या का बल क्या था और उन्हें क्या फल प्राप्त हुआ? और सूर्यदेव आपके सान्निध्य में साक्षात् मूर्तिमान होकर कैसे स्थित हुए?।(१-५) ईश्वर (शिवजी) ने कहा हे देवी! सुनो, मैं तुम्हें वह रहस्यमयी और परम शुभ कथा सुनाता हूँ, जिसे सुनने मात्र से जीव जन्म-मृत्यु के संसार रूपी बंधन से मुक्त हो जाता है।मेरे ही देह से उत्पन्न यह ‘वाराणसी’ नगरी जगत में विख्यात है, वहीं कल्याणमयी ‘मुक्तिमण्डपिका’ के समान मणिकर्णिका तीर्थ स्थित है। उसी मणिकर्णिका के तट पर परम भक्त सूर्यदेव ने आकर, संसार रूपी रोग के विनाश के लिए उत्तम शिवलिंग की आराधना की। हे देवेशि! उन्होंने जगन्नाथ (शिव) का चिन्तन करते हुए मणिकर्णिका के शुभ तट पर ‘बालुकामय’ (रेतीले) ईश्वर की स्थापना की।क्रोध को जीतकर, निराहार रहकर और निरंतर ‘पञ्चाक्षर मंत्र’ (नमः शिवाय) के जप में लीन होकर सूर्यदेव ने हजारों वर्षों तक तपस्या की। हे महादेवि! उनके तप के प्रकाश से सारा आकाश देदीप्यमान हो उठा और उस तपस्या ने चराचर तीनों लोकों को जीत लिया।तब मैं उन तेज के अक्षय पुंज (सूर्य) के सामने प्रकट हुआ। उन्हें देखकर मैंने ये वचन कहे— हे सहस्रांशु (हजारों किरणों वाले)! हे सुव्रत! मैं तुम्हारी इस तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम्हारे मन में जो भी इच्छा हो, वह वर मांग लो, मैं उसे पूर्ण करूँगा।”६-१३ सूर्यदेव ने कहा:हे देव! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और मुझे वर देना चाहते हैं, तो इस शुभ मणिकर्णिका तट पर सदा आपका सान्निध्य बना रहे।मेरे द्वारा स्थापित इस लिंग के दर्शन-पूजन से मनुष्य जो पुण्य प्राप्त करे, उसका आधा फल मुझे भी प्राप्त हो और आपकी चरणों में मेरी अटल भक्ति बनी रहे। १४-१५ ईश्वर ने कहा मेरे ही तेज से तुम यहाँ लिंग रूप में स्थित हो। अब चराचर लोकों में यह लिंग तुम्हारे ही नाम से ख्याति प्राप्त करेगा ।यह शिवलिंग ‘आदित्येश्वर’ के नाम से विख्यात होगा, जिसके दर्शन मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाएगा।हे भास्कर! तुम भी अपने विग्रह (शरीर) के साथ साक्षात् यहीं विराजमान रहो। तुम समस्त लोकों के ताप को हरने वाले और अत्यंत निर्मल स्वरूप वाले होकर यहाँ स्थित हो।भविष्य में मेरी लीला से तुम बारह भागों में विभक्त होकर (द्वादश आदित्य के रूप में) मेरी इस काशी पुरी की रक्षा करोगे।तुम अनेक रूपों में भक्तों का सदा कल्याण करोगे। मेरी कृपा से तुम विविध प्रकार से जगत का मंगल करो।जो मनुष्य मणिकर्णिका में स्नान करके भक्तिपूर्वक तुम्हारे दर्शन करेगा, उसे कभी शारीरिक व्याधि (बीमारी) का दुःख और दरिद्रता नहीं घेरेगी।विशेषकर रविवार के दिन, अथवा षष्ठी या सप्तमी तिथि को जो तुम्हारा पूजन करेगा, उसे अनंत पुण्य की प्राप्ति होगी।नेत्र रोगों के विनाश के लिए तुम ही सनातन देव हो। तुम्हारी कृपा से मनुष्य दिव्य दृष्टि (नेत्र ज्योति) प्राप्त करेगा।गंगाजल से अविनाशी ‘आदित्येश्वर’ को स्नान कराकर जो पूजन करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है,।जो लाल कनेर के पुष्पों, धूप, दीप और नैवेद्य से मेरी प्रसन्नता के लिए (आदित्येश्वर का) पूजन करता है, वह सूर्य के समान कांति प्राप्त करता है।हे शुभे! इस प्रकार मैंने वहाँ सूर्य को अत्यंत दुर्लभ वरदान दिया। तभी से भगवान सूर्य मणिकर्णिका तट पर साक्षात् मूर्तिमान होकर स्थित हैं। १६-२६
वाराणसी 23 दिसंबर, मणिकर्णिका तीर्थ है
महाश्मशान नहीं किसी भी वेद पुराण में मणिकर्णिका शमशान नहीं दिखाया गया है, मणिकर्णिका मोक्ष का द्वार है, यहां श्री विष्णु चरण पादुका है, जबकि जलासेन घाट महा श्मशान है, महाश्मशान के बाद काशी में किसी को मोक्ष मिलता है तो मणिकार्णिका तीर्थ से, इसकी पवित्रता इस बात से जान सकते है कि पच कोशी यात्रा यहां से ही शुरू होता है, अन्य कई अन्य धार्मिक आयोजन की यह जन्म स्थली है, भगवान विष्णु ही मोक्ष के देवता है, इसलिए इसे काशी के महा तीर्थ के रूप में मान्यता है, पौष मास के तृतीया पर यहां पूजन का विशेष महत्व है इसी के चलते आज श्री काशी तीर्थ पुरोहित सभा के अंतर्गत श्री विष्णु चरण पादुका मणिकर्णिका सेवा समिति ने दर्शन पूजन के साथ हीकाशी अनुनाद कार्यक्रम का आयोजन समिति के संस्थापक पंडित देवेंद्र नाथ शुक्ल ने अध्यक्ष पंडित मनीष नंदन मिश्र, पंडित विवेक शुक्ला के संयोजन में किया , पूजन के बाद काशी अनुनाद कार्यक्रम बजड़े पर रंगा रंग सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ जिसमें भजन के साथ ही चैती, ठुमरी, दादरा और कजरी का गायन हुआ, सभी लोग भाव विभोर होकर रंगा रंग कार्यक्रम में भाव विभोर हो गए, मां गंगा के गोद में बजड़े पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि रहे नगर प्रमुख, नगर के विभिन्न नामचीन संस्थाओं की तरफ से भारी संख्या में शामिल लोगों ने काशी अनुनाद कार्यक्रम को शानदार बनाने में अहम भूमिका निभाई, कार्यक्रम में पूजन पंडित°मनीष नंदन मिश्र व पंडित.विवेक शुक्ल के नेतृत्व में हुआ कार्यक्रम में मुख्य रूप से. अरविंद मिश्रा, देवेन्द्र नाथ शुक्ल,कन्हैया त्रिपाठी, आनंद कृष्ण शर्मा, मनीष नंदन मिश्र, विवेक शुक्ल, श्री कांत पांडे, सुनील शुक्ल,कान्हा पांडे,ब्रजेश पाठक तनुश्री रॉय,दिलीप सिंह, आदि लोग…. शामिल रहे।